लेख साहित्य

प्रकृति की विनाश लीला (आलेख)

प्राकृतिक आपदाएँ प्रकृति प्रदत्त उथल- पुथल,बाढ़, भूकंप, ज्वालामुखी जैसी समस्त विनाश कारी घटनाओं को कहते हैं।

हमारे धार्मिक विश्वास के अनुसार ब्रह्माण्डपति परम ब्रह्म परमात्मा की आह्लादिनी शक्ति को प्रकृति कहा गया है उस प्रकृति के आधिदैविक रूप को अधिष्ठात्री महामाया कहा गया है।इसीलिए समाज में , प्राकृतिक आपदाओं और विनाशक परिस्थितियों को ईश्वरीय कोप के रुप में देखा जाता है।
आजकल बाढ़, भूकंप, सुनामी,आकाशीय बिजली, बादल फटना , भूस्खलन, हिमस्खलन आदि प्राकृतिक आपदाएं, यत्र -तत्र होती हुई देखी व सुनी जा रही हैं।
जो मनुष्य व विज्ञान के नियंत्रण से परे है।
इन प्राकृतिक आपदाओं के प्रकोप से बचने का एक मात्र उपाय है , मनुष्य धर्म के अनुसार प्रकृति को संवर्धित करते हुये जीवन जीये।
किसी भी हालात में प्रकृति का उलंघन न हो।
यदि हम नियंत्रण में नहीं हुए और अनियंत्रित हो मनमानी करते हुए प्रकृति को नुकसान पहुँचाते रहे तो निश्चिंत ही समस्त विश्व समुदाय बाढ़,भूकंप, समुद्री चक्रवात,तुफानी चक्रवात ,ज्वालामुखी जैसे प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता रहेगा।
क्योंकि ईश्वर की सृष्टि में हर चीज आपस में जुड़ी हुई है। अंधाधुंध आदमी आधुनिकीकरण की दौर में पेड़ पौधे कटने पर आक्सीजन की कमी और कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता के कारण ओजोन परत को क्षीण कर रहा है । जिसके कारण अत्यधिक तापमान अत्यधिक हिमस्खलन अति वर्षा और बाढ़ से तबाही की स्थिति बनती जा रही है।
वर्तमान में कुछ वर्षों पूर्व, गुजरात का भूकंप , उत्तराखंड का जलप्रलय, उड़िसा का समुद्री चक्रवात , केरल की बाढ़ त्रासदी और हाल ही में गुरु नाम हमारी का प्रथम और द्वितीय दो अद्वितीय दौड़ की तैयारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से हम सबको सीख लेनी चाहिए। और मानवता तथा ईश्वर के सृष्टि विधान की अवहेलना से बचना चाहिए।
अतः हमें कोशिश करनी चाहिए कि,प्रकृति को बढ़ावा देकर, पेड़ पौधे पीपल,नीम आदि वृक्षों को रोपकर, प्रदूषण को नियंत्रित कर, प्रकृति द्वारा पृथ्वी की सुरक्षा के लिए बनाए गए ओजोन परत में हो रहे क्षरण को रोककर भविष्य में होने वाली विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं से बच सकें
जयहिंद जयभारत,
नारायण!!
पं रामजस त्रिपाठी नारायण

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