लेख साहित्य

कारगिल विजय दिवस – विधा-लावणी छंद

मिली सूचना चरवाहे से, दुश्मन ऊपर आया है।
अनवांक्षित है हरकत उसकी,
अपना पैर जमाया है।।
खबर हुई तब मुख्यालय को, हलचल संसद अंदर में।
वीर बाँकुरे किए चढ़ाई, दुबका चूहा बंकर में।।

झटपट ही तैयार हुआ था, दस्ता वीर जवानों का।
मातृभूमि के प्रेम दीप के, लौ आतुर परवानों का।।
ऊँचे पर्वत राह कठिन थे, खोजी बन कर जाना था।
फौलादी शमशीर चमकती , केशरिया -सा बाना था।।

अरि के शीश काटने निकले, माँ के बेटे वीर अमर।
ललनाओं ने अश्रु पोछ ली, वीर बाँकुरे कसे कमर।।
टूट पड़े वे पंचानन -से, गुत्थम- गुत्था युद्ध किए।
रणचंडी रण विचरण करती,
भैरव बाबा क्रुद्ध हुए।।

कारगिल श्मशान बना था, दुश्मन ऊपर नीचे हम।
जूझ रहे थे वीर बाँकुरे, बरस रहे थे गोले बम।।
वायुयान गोले बरसाये, सैनिक मन हर्षाया था।
गरजरही थी तोपें अपनीें , बैरी मन घबराया था।।

वीर बाँकुरे ध्वज लहराए,
जय हो बाबा बर्फानी।
उदित किए पुरुषार्थ बाँकुरे, दुश्मन माँगा तब पानी।।
भाग रहा था कायर कपटी, छोड़ -छाड़ शव साथी का।
नीयत उनकी साफ नहीं थी, काम नहीं था माफी का।।

छद्म वेश में घुसे भेड़िये, द्रास बटालिक सेक्टर में।
लेह मार्ग को रोक दिये थे,
सियाचीन के चक्कर में।।
अपनी वे औकात भूलकर, खंजर घोपें अंदर में।
बार -बार वे मुँह की खायें, लाज न आती अंतर में।।

सहस अठारह फिट चोटी पर, भिड़े बिहारी वनवारी।
शौर्य दिखाकर नाम कमाये, परम वीर मेडल न्यारी।।
कीर्ति चक्र ने कीर्ति बढ़ायी, वैरी आत्मा शर्मायी।
वीर चक्र शत्रुघ्न अशोका, को सेना पा हर्षायी।।

विजय मिली थी भारत को अब, घर-घर में खुशहाली थी।
मुँह की खाकर बैरी लौटा , उसके घर बदहाली थी।।
अमर सपूतों की धरती पर, झंडा केशरिया धानी।
तीन रंग का मिश्रण इसमें, इसके हित सब बलिदानी।।

नमन करें हम अमर शहादत, विजय दिवस को याद करें।
मातृभूमि हित अमर हुए जो, उन परिजन को याद करें।।
सैनिक जीवन एक तपस्या, मिलकर हम सम्मान करें।
वीरोचित गाथा को गाकर, अपने मन अभिमान भरें।।

जय हिंंद! जय भारत!
जय जवान!जय विज्ञान!
नारायण !नारायण! नारायण!
स्वरचित
पं रामजस त्रिपाठी नारायण

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