लेख साहित्य

सार छंद

धर्म नाम की चीज नहीं है, कैसी नेतागीरी।
निराधार आरोप लगाएं, देखो घटना खीरी।
जहाँ आग लगती दिखती है, वहाँ पहुंचते नेता।
भड़काते भोली जनता को, झगड़ा झूठ प्रणेता।

बात – बात पर झूठ बोलते, आंखों के हैं अंधे।
लंबे – लंबे भाषण देते, करते गोरखधंधे।
गुंडा बदमाशी का इनको, मिला हुआ है पट्टा।
बॉडीगार्ड संग में रखते, भैया हट्टा – कट्टा।

जनता मरती झगड़ों में है, नेता मौज उड़ाते।
जेलों में भी नेता रहकर, मेवा मिश्री खाते।
ए सी से कम सफर न करते ए सी में ही सोते।
घटना घटी कहीं वहाँ जाकर, झूठे आँसू रोते।

एक बार यदि बने विधायक, नौ-नौ होती गाड़ी।
अनगिनती हैं चमचे घूमें, आगे और पिछाड़ी।
जनता के विकास का पैसा, अपने हित लगवाते।
एक बार यदि जीत गये तो, खलनायक हो जाते।

लुच्चे गुंडे नेताओं को, ऐसा सबक सिखाएँ।
माला इनके गल में, मिलकर जूतों की पहनाएँ।
असहयोग कर दो चुनाव में, कह दो इनसे भागो।
थू -थू कर दो उनके मुँ ह पर जागो जनता जागो।

प्रेम सिंह राजावत प्रेम

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