लेख साहित्य

हिंदी अंतस में विराजमान है तो उसे एक दिवस के दायरे में बाँधना कहाँ तक उचित है ।

मत्तगयंद सवैया
अंक सुहाय लिएअचला नवजात किलोल करै यह हिंदी।
मोह रही जन-मानस-मंदिर बोल खगोल चरै यह हिंदी ।
ब्रह्म निनाद सुपावन गुंजित ओम अमोल भरै यह हिन्दी ।
शब्द सुसंस्कृति कर्ण प्रिया हिय संकट बोल हरै यह हिंदी।

डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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