उत्तर प्रदेश देश-दुनिया

कोरोना काल मे डॉक्टर, पुलिस और सफाई कर्मी नायक बनकर उभरे है।

सिर्फ नायक नहीं बल्कि महानायक बन कर उभरे हैं। सुबह बैठे-बैठे अचानक कुछ पंक्तियां बन गईं।

जान हथेली पर लेकर निकली है टोली मस्तानों की।
सुभाष ,भगत , आजाद ऊधम, जैसे परवानों की।
युद्ध नया है, रूप नया है, नाम नया है “कोरोना”।
पुलिस, डॉक्टर, सफाईकर्मी नई पहचान दीवानों की।

निसंदेह आज हमारे डॉक्टर, नर्स ,स्वास्थ्य कर्मी ,पुलिसकर्मी और सफाई कर्मी अपनी जान की परवाह किए बग़ैर अपने कर्तव्य का बखूबी निर्वाहन कर रहे हैं। नमन है ऐसे शूरवीरो को जो विपरीत परिस्थितियों में भी बहुत बेहतर काम कर रहे हैं।

इन विषम परिस्थितियों में पूरे देश में ज़रूरी सेवाओं से जुड़े हुए लोग भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वह चाहे प्रशासनिक अधिकारी हों, दूध वाले हों, सब्जी वाले हों, दुकानदार हो या किसान हों।

कोरोना से इस लड़ाई में एक वर्ग और है जो दिन रात मैदान में डटा हुआ है। वह वर्ग है पत्रकारिता से जुड़ा हुआ। परंतु इस वर्ग में जो लोग फील्ड में रिपोर्टिंग कर रहे हैं उनके साथ बहुत ही बड़ा भेदभाव है। उनमें से ज्यादातर लोगों की ना तो कोई सैलरी है और ना ही कोई अन्य सुविधा है। साथ ही कहीं-कहीं उन्हें पुलिस के डंडे भी खाने पड़ रहे हैं। स्टूडियो या ऑफिस में बैठे लोग, टीवी चैनलों के मालिक, अख़बारों के मालिक और संपादक तो खूब फल-फूल रहे हैं और धक्के खा रहा है श्रमजीवी पत्रकार।
एक श्रमजीवी पत्रकार को सरकार, प्रशासन, पुलिस और पब्लिक तक कोई भाव नही दे रहा है।

कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं पत्रकारिता की निष्पक्षता पर। सवाल उठना स्वाभाविक भी है। कुछ लोग भारतीय मीडिया की तुलना कर रहे हैं अमेरिकी मीडिया से और भारतीय मीडिया को दब्बू बता रहे हैं। यह सत्य भी है। अमेरिका में मीडिया को जितनी स्वतंत्रता है वह भारत में बहुत दूर की कौड़ी है। जस्टिस काटजू ने कहा था कि “सत्ताधारीओं के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए भारतीय मीडिया पर्याप्त स्वतंत्र नहीं है। समाचार पत्रों के मालिक और टीवी चैनलों के मालिकों में सरकार के दबाव के आगे खड़े रहने की ताकत नहीं है। वह अनिवार्य रूप से “प्रणाम” करते हैं क्योंकि उन्हें अपने अन्य व्यवसायों की सुरक्षा करनी होती है।” कुछ लोग ज़रूर सत्ताधारिओं के खिलाफ मजबूती से खड़े होते हैं परंतु उनके पास आर्थिक सुरक्षा का अभाव होता है। आप यदि सरकार को चुनौती देते हैं तो आपके सामने अपनी नौकरी खोने का खतरा होता है। भारत जैसे गरीब देश में बहुत लोगों के लिए नौकरी केवल आजीविका चलाने का साधन नहीं है बल्कि उनके और उनके परिवार के लिए अस्तित्व का प्रश्न है। अगर सरकार के ख़िलाफ़ खड़े होने का मतलब अपनी सुरक्षा को जोखिम में डालना है तो अधिकतर लोग सावधानीपूर्वक सोचेंगे और इसके ख़िलाफ़ निर्णय लेंगे। अमेरिकी मीडिया यहां से बहुत अलग है। अमेरिकी पत्रकारों के पास अपने नियमों और ज़मीर के साथ खड़े रहने के लिए बहुत वित्तीय स्रोत होते हैं, हमारे पास नहीं हैं। जिस कारण हमें समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यही कारण है कि आजकल पत्रकार शक्तिशाली लोगों के साथ मित्रता करना चाहते हैं।
भारत में ज़्यादातर पत्रकार फ्रीलांसर है। किसी को तनख्वाह नहीं मिलती बल्कि जितनी स्टोरी करो उतने पैसे मिलते हैं। एक अख़बार की स्टोरी के डेढ़ सौ रुपए, टीवी स्टोरी के लिए 500 से 1000 रुपये। महीने में कितनी स्टोरी कर लेंगे यह श्रमजीवी पत्रकार। ऊपर से स्टोरी चलेगी या नहीं चलेगी, ख़बर छपेगी या नहीं छपेगी यह भी उनके हाथ में नहीं है। धूप हो ,गर्मी हो, बरसात हो अपना ही पेट्रोल जलाकर जाना है। यही कारण है कम वेतन या बिना वेतन की वजह से पत्रकारिता का अपराधीकरण हुआ है। पत्रकारिता भी कई तरह के लोग कर रहे हैं। एक वह लोग जिनके लिए पत्रकारिता एक नशे की तरह है, दूसरे वह लोग हैं जो अपने काले कारनामों को छुपाने के लिए पत्रकारिता कर रहे हैं तीसरे वह लोग हैं जिनका फुल टाइम पेशा ही पत्रकारिता है,चौथे वो लोग हैं जो अपना नाम चमकाने के लिए पत्रकारिता कर रहे हैं,पाँचवे वो लोग हैं जो केवल शौक़ के लिए पत्रकारिता कर रहे हैं। मजे की बात यह है कि फुल टाइम पत्रकार ही सबसे कम हैं।

कोरोना के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई को तो हम सब लोग मिलकर जीत ही लेंगे यह तो निश्चित है। लेकिन भारत के बेहतर भविष्य के लिए आने वाले समय में हमें स्वास्थ्य सेवाएं, पुलिस सेवाएं और सफाई सेवाओं को बहुत प्रभावी रूप से सक्षम बनाना होगा साथ ही साथ भारतीय मीडिया की स्वतंत्रता और आर्थिक सुरक्षा पर भी काम करने की बहुत ज़रूरत है।
भारत को बहुत ज़्यादा ज़रूरत है स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया की, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की, सक्षम पुलिस बल की, और प्रशिक्षित सफाई कर्मियों की।
जितेन्द्र चौधरी
प्रधान संपादक
विशाल इंडिया

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