नई दिल्ली

समरस व संतुलित समाज

नई दिल्ली। विजय दशमी शब्द में राष्ट्रीय शौर्य व स्वाभिमान का भाव समाहित है। किंतु इसमें दंभ नहीं है। बल्कि इस दिन प्रभु राम ने दंभ अहंकार और असत्य को परास्त किया था। यह भारतीय चिंतन की विशेषता है। इस प्रसंग में अहंकार को पराजित करने का भी सन्देश है।
प्रभु श्री राम ज्ञान के प्रतीक है। दूसरी तरफ रावण अहंकार की प्रति मूर्ति था। वह उच्च कोटि का ज्ञानी था। लेकिन उसके ज्ञान का प्रकाश अहंकार के अंधकार में समाहित हो गया था। ज्ञानी का अहंकार उसे सत्य मार्ग से विरत कर देता है। गोस्वामी जी लिखते है-
रागु रोषु इरिषा मदु मोहु, जनि जनि सपनेहुं इन्ह के बस होहु।
सकल प्रकार बिकार बिहाई,मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।

तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपासिंधु भगवान॥
शस्त्र व शास्त्र का एक साथ पूजन राजधर्म का भी सम्यक विचार है। गीता में भगवान कहते भी है-
परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे।
विजय दशमी का सन्देश व्यापक है। युगों युगों तक भारत इस संस्कृति पर चलता रहा। इस आधार पर उसे विश्वगुरु की प्रतिष्ठा मिला। दुनिया में जब मानव सभ्यता का विकास नहीं हुआ था,यहां पर के गुरुकुल शिक्षा व शोध के केंद्र बन चुके थे। संस्कृत के विशाल वांग्मय की रचना की गई। इसके साथ ही राजधर्म कूटनीति सुरक्षा अस्त्र शस्त्र का विज्ञान भी अस्तित्व में आया। आयुर्वेद व योग के माध्यम से स्वस्थ्य जीवन के नियम व उपचार का मार्ग दिखाया गया। प्रकृति व पर्यावरण की चेतना का विचार आज भी प्रासंगिक है। रामकथा में जीवन से संबंधित प्रत्येक पक्ष का किसी न किसी रूप में समावेश है। बाल्मीकि रामायण में प्रकृति का संवर्धन करने वाले वृक्षों व वाटिकाओं का वर्णन है। इनमें से अनेक वृक्ष विलुप्त हो चुके है। अनेक आज भी अस्तित्व में है। इनका लाभ उठाया जा सकता है। क्योंकि इन सभी का औषधीय महत्व है। प्रभु राम अपने आचरण से प्रत्येक स्तर पर मर्यादा का सन्देश देते है। इसमें पुत्र धर्म से लेकर राजधर्म भी सम्मलित है। भारत में विजयी होने पर अहंकार का भाव कभी नहीं रहा। हम कभी भी अतिवादी नहीं हो सकते। स्वतंत्रता और समता के लिए बंधुभाव होना चाहिए। विश्व की अर्थव्यवस्था में एक हजार वर्ष तक भारत नंबर वन पर रहा। उस समय विश्व के बहुत बड़े भूभाग पर हमारा प्रभाव तो था। हमारा साम्राज्य भी बहुत बड़ा था। लेकिन ऐसा सब होने के बावजूद भारत ने दुनिया में जाकर किसी देश को समाप्त नहीं किया। विजय दशमी राष्ट्रीय भावना के जागरण का ही पर्व है। इस विचार से प्रेरित होकर ही  विजय दशमी पर आरआरएस की स्थापना हुई थी। इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार सक्रिय स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे। उन्हें विश्व गुरु व सोने की चिड़िया का परतन्त्र होना विचलित करता था। उन्होंने इस प्रश्न पर व्यापक व गम्भीर शोध किया था। वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राष्ट्रीय गौरव,स्वाभिमान व एकता के अभाव का भारत को नुकसान हुआ। विदेशी आक्रांताओं ने इसका लाभ उठाया। राष्ट्रीय भाव व सामाजिक समरसता के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की गई। राष्ट्र को पुनः परम् वैभव के पद पर आसीन करना इसका लक्ष्य बनाया गया। संघ अनवरत इस दिशा में कार्य कर रहा है। हिन्दू जीवन पद्धति में सत्य,अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह,शौच, स्वाध्याय,संतोष,तप को महत्व दिया गया। समरसता सद्भाव से देश का कल्याण होगा। जब भारत एवं भारत की संस्कृति के प्रति भक्ति जागती है व भारत के पूर्वजों की परंपरा के प्रति गौरव जागता है। तब सभी भेद तिरोहित हो जाते हैं। भारत ही एकमात्र देश है जहाँ पर सबके सब लोग बहुत समय से एक साथ रहते आए हैं। सबसे अधिक सुखी मुसलमान भारत देश के ही हैं। दुनिया में ऐसा कोई देश है जहाँ उस देश के वासियों की सत्ता में दूसरा संप्रदाय रहा हो। यहाँ सभी मजहब के लोगों को सभी अधिकार मिले हुए है। उदार चिंतन भारत की ही विशेषता है। मोहन भागवत के अनुसार इस स्वभाव को हिंदू कहते हैं। हम हिंदू हैं और हम भारतीय हैं। हम मुसलमान हैं लेकिन हम अरबी अथवा तुर्की नहीं हैं। शिक्षा में आत्म भान व गौरव भाव होना चाहिए। गौरवान्वित करने वाली बातों को देने वाले संस्कार शिक्षा से, सामाजिक वातावरण से एवं पारिवारिक प्रबोधन से मिलना चाहिए। भारत की प्रकृति मूलतः एकात्म है और समग्र है। अर्थात भारत संपूर्ण विश्व में अस्तित्व की एकता को मानता है। इसलिए हम टुकड़ों में विचार नहीं करते। हम सभी का एक साथ विचार करते हैं। जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। निर्माण का यह विषय पूर्ण हुआ। लेकिन श्रीराम तो भारत के आत्मतत्व में हैं। शाश्वत है। इसलिए श्रीराम का विषय कभी समाप्त नहीं हो सकता। श्रीराम भारत के बहुसंख्यक समाज के लिए भगवान हैं। जिनके लिए भगवान नहीं भी हैं,उनके लिए आचरण के मापदंड तो हैं। संघ प्रमुख ने कहा कि यह आजादी का स्वर्ण जयंती वर्ष है। त्याग और बलिदान के बाद स्वतंत्रता मिली और उसके साथ ही विभाजन का दर्द भी मिला। वर्तमान पीढ़ी को उस पीड़ा की जानकारी होनी चाहिए। जाति,वर्ग, भाषा,प्रांत और निजी अहंकारों के भेद में बंटे समाज के चलते भारत पर विदेशी आक्रांताओं ने कब्जा जमाया था। इन्होंने भारतीय धर्म, संस्कृति,संस्कार, परम्परा और मंदिरों पर आघात किए। विभाजन के तत्वों को पहचानना होगा। असम,पश्चिम बंगाल एवं बिहार के सीमावर्ती जिलों में मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। जो स्पष्ट रूप से बांग्लादेश से अनवरत घुसपैठ का संकेत देता है। छह वर्ष फ्लड संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के प्रतिवेदन किया था। इसमें जनसंख्या असंतुलन पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी। सरकार से आग्रह किया गया है कि देश में उपलब्ध संसाधनों, भविष्य की आवश्यकताओं एवं जनसांख्यिकीय असंतुलन की समस्या को ध्यान में रखते हुए देश की जनसंख्या नीति का पुनर्निर्धारण कर उसे सब पर समान रूप से लागू किया जाए। सीमा पार से हो रही घुसपैठ पर पूर्णरूप से अंकुश लगाया जाए। राष्ट्रीय नागरिक पंजिका का निर्माण कर इन घुसपैठियों को नागरिकता के अधिकारों और भूमि खरीद के अधिकार से वंचित किया जाए। जनसंख्या में असंतुलन गंभीर विषय है। देश को जनसांख्यिकीय असंतुलन से बचाने के सभी विधि सम्मत प्रयास करना आवश्यक है। सीमावर्ती इलाकों में हो रही विदेशी घुसपैठ और देश में चल रहे धर्म परिवर्तन की वजह से जनसंख्या असंतुलन बढ़ा है। यह असंतुलन देश की एकता,अखंडता एवं सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर संकट का कारण बन सकता है। विभिन्न धर्मों के लोगों के प्रजनन दरों में भी हमें भिन्नता नजर आती है।
जनगणना के आकड़ों में भी काफी बदलाव नजर आते हैं। दुनिया में प्रचलित पूंजीवाद और साम्यवाद मौजूदा समय में नई समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इनसे उपजी समस्याओं का समाधान अन्य देशों के पास नहीं है। यांत्रिकीकरण से बढती बेरोजगारी,नीति रहित तकनीकी के कारण घटती मानवीयता एवं उत्तरदायित्व के बिना प्राप्त सामर्थ्य उनके कुछ उदाहरण हैं। भारत के पास तीसरा विकल्प है। यह तीसरा रास्ता दुनिया के लिए पथ दर्शक साबित होगा। जिस प्रकार योग को पूरी दुनिया ने अपनाया है। अरब देशों में मंदिर बन रहे हैं। यह इस बात का द्योतक है कि भारत विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर है। सांस्कृतिक सामाजिक संगठन होने के बावजूद संघ को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। गांधीजी की हत्या का मिथ्या आरोप संघ पर लगाया गया। स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह किया। फलस्वरूप सरकार को बिना शर्त संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। तीन कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ आंदोलन और दिल्ली के शाहीनबाग जैसी घटनाओं के पीछे कुछ शक्तियां समाज को तोड़ने का कार्य कर रही हैं।

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